Saturday, May 7, 2011

कविता

{ १}

एक शब्द नहीं बोली
रख लिया पत्थर
ह्रदय पे
वेदना सब कुछ कह गए
शब्द
आँखों से खीर खीर !


{ २ }


नन्ही बूंदें
अब भी अपना अस्तित्व
दर्शा रही है
टीलों के मुहानों पर
मानों, मुख चूम रही हो
तब तक
जब तक पांवों से अछूती रहे !


{३}

ढेरों
पीपल के टूटे पत्ते
पानी पे यू आलिंगंबध
मानो ,
सहला रहे
मलहम लगा रहे हो
तालाब दिन भर
चिलचिलाती धूप में
कितना जला है बेचारा !

19 comments:

रश्मि प्रभा... said...

bejod bhaw

नीरज गोस्वामी said...

बेजोड़ रचनाएँ हैं सुनील जी...तीसरी वाली को तो बार बार पढ़ रहा हूँ...कमाल के शब्द और भाव गूंथे हैं इस रचना में...वाह
नीरज

इस्मत ज़ैदी said...

नन्ही बूंदें
अब भी अपना अस्तित्व
दर्शा रही है
टीलों के मुहानों पर
मानों, मुख चूम रही हो
तब तक
जब तक पांवों से अछूती रहे !

kyaa baat hai ,bahut badhiya rachna teesree wali bhi bahut badhiya hai
badhai !

सुधाकल्प said...

रचनायें सार युक्त हैं।शब्द-चयन सुन्दर है ।बधाई ।
सुधा भार्गव

मेरे भाव said...

एक शब्द नहीं बोली
रख लिया पत्थर
ह्रदय पे
वेदना सब कुछ कह गए
शब्द
आँखों से खीर खीर !....

sundar vimb

Rajiv said...

"ढेरों
पीपल के टूटे पत्ते
पानी पे यू आलिंगंबध
मानो ,
सहला रहे
मलहम लगा रहे हो
तालाब दिन भर
चिलचिलाती धूप में
कितना जला है बेचारा !"
सुनील जी,आपकी तीनों ही क्षणिकाएँ एक से बढ़कर एक हैं.आखिरीवाली तो लाजवाब लगी मुझे.बधाई.

बलराम अग्रवाल said...

भाव की दृष्टि से तीसरी रचना अत्यन्त प्रभावशाली है।

Rachana said...

ढेरों
पीपल के टूटे पत्ते
पानी पे यू आलिंगंबध
मानो ,
सहला रहे
मलहम लगा रहे हो
तालाब दिन भर
चिलचिलाती धूप में
कितना जला है बेचारा !
bahut sunder
rachana

योगेन्द्र मौदगिल said...

hmmmmmm...kitna jalaa hai bechaara..

wah sunil ji wah......sadhuwaad

नवनीत पाण्डे said...

बहुत सुंदर अनुभूतियां

भारतेंदु मिश्र said...

तीसरी कविता का रूपक अच्छा है किंतु वह और माँजने योग्य है।

राजेश उत्‍साही said...

तीनों पहले भी पढ़ी हैं। तीसरी के भाव स्‍पष्‍ट हैं। बाकी दो उलझी हुई हैं। छोटी रचनाएं तभी प्रभावी होती हैं जब उनके भाव सरल और एकदम स्‍पष्‍ट हों।

girish pankaj said...

chhotee magar saar-garbhit hai ye kavitaayen . badhai...shubhkamanae...

ajit gupta said...

एक बात बताएं कि शब्‍द है खिरना, आपने प्रयोग किया है खीर खीर। खीर तो दूध से बनी मिठाई है। क्‍या मैं सही हूँ?

Akshita (Pakhi) said...

बहुत सुन्दर रचना ..बधाई.


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सुमन'मीत' said...

सुनील जी ..पहली बार आपके ब्लोग पर आई हूँ ..बहुत अच्छा लगा ...

सुरेश यादव said...

प्रिय सुनील जी .आप की मार्मिक कविताओं के लिए हार्दिक बधाई .

Manav Mehta said...

behad sundar...

कुमार पलाश said...

कमाल के शब्द और भाव गूंथे हैं इस रचना में.