Friday, January 3, 2014

गतांक से आगे और समापन क़िस्त 
नाटक -  किनारे से परे। .
(पुनः दृश्य अस्मां व सुमन की वार्तालाप संदर्भित)

सुमन- रजामन्दी से।
अस्मां बी- काहे की, जब से मेरी सगाई की बात चलनी शुरू हुई मैं परेशान रहने लगी थी, लेकिन उस दिन आशू की बेरूखी से मैं पागल सी हो गई......... फिर मैने धमकी दे डाली, कहा कि अगर तुम इस जन्म मैं मेरे नहीं हो सके तो मैं अपनी जान दे दूंगी, चाहता तो वो भी था मुझे पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कठिनाईयों से सामना करने की, फिर जाने क्या जोश आया मेरा हाथ पकड कर चल पडा कोर्ट की ओर.. मैरिज करने, मैरिज की और ले गया अपने घर......... उसकी मां ये देख आग-बबूला हो उठी......... फिर ना जाने क्या सोच ठण्डी पड गई गले लगा लिया।
सुमन- और आफ घर ?
अस्मां बी- घर......... उसके दरवाजे मेरे लिए सदा के लिए बन्द हो गए......... मुझे वो क्षण अब भी ज्यूं का त्यूं याद है......... मम्मी-पापा का हाथ मुझे आर्शीवाद दूधो नहाओ पूतो फलो, सदा सुहागन रहो कि बजाए......... तू हमारे लिए मर गई कह कर दिया और मेरी बनाई वो पेंटिंग जो मम्मी को बहुत अच्छी लगती थी मेरी पहली पहली पेंटिंग......... फाड दिया मम्मी ने, मम्मी ने एक तरह से अपना आत्मिक रिश्ता ही मिटा दिया।
सुमन- क्या खास था उसमें ?
अस्मां बी- मैं ही थी, मम्मी की गोद में जब छोटी सी थी......... मुझे सुला रही थी वो......... तब पापा ने फोटो खींचा था उसी को मैने कैनवास पे उतारा था, नाज करती थी मुझ पे।
सुमन- क्या फिर खैर खबर ली उन्होने.........।
अस्मां बी- क्या मरने के बाद मुर्दे को घर में जगह मिली है कभी......... उन्होने सोचा होगा कि हमारी कोई आशा जन्मी ही नहीं थी, फिर सोचा अपनी सांस में मां की छवि देखूंगी......... मगर किस्मत का अहम् खेल तो अभी बाकी ही था, शादी के तीन साल बाद भी मैं मां नहीं बन पाई थी......... एक बांझ को भला कौन पसन्द कर सकता है.........बच्चों की चाह किसे नहीं होती है......... अपने खानदान का चिराग कौन बुझने देना चाहेगा, मुझे तलाक दे दिया गया य सुना तो पैरों तले से जमीन निकल गई आंखे दबदबा गई......... मिन्नतें करती रहीं कि ऐसी सजा मत दो मुझे......... मगर परिणाम ठाक के तीन पात उस समय रह रह कर मुझे मम्मी का चेहरा याद आ रहा था......... फर्क कुछ भी नहीं था उन दोनों पलों में, मेरी ही तरह सास अडग थी अपने निर्णय पे, अब तक सुना ही था, उस दिन देख भी लिया की जमाना स्वयं को दोहरा रहा था।
सुमन- और अशरफ ?
अस्मां बी- अशरफ......... वो मुआ भी मेरे से धीरे धीरे खिंचने लगा था.........मुझे भी लगने लगा कि उसने मेरी तरह आत्मा से कभी नहीं चाहा......... मेरे कदम-कदम का साथी नहीं बन सका......... अस्मां तो शरीर से मैं बन चुकी थी मगर आत्मा अब भी आशा की थी, उम्र के बीस साल तक भगवान को पूजने वाली पर जल्द ही पैगम्बर साहब कैसे हावी हो सकते थे......... और उस समय मेरी सांस जलभुन पडती थी जब हाथ तो उनकी तरह मगरीब की नमाज अदा करने ऊपर उठते मगर मुंह से-’’जय हनुमान ज्ञानगुन सागर जय कपीस तिहु लोक उजागर‘‘ फूट पडता था और एक कट्टर मुस्लमानी मुझे कोसने लगती यूं धीरे धीरे वो अशरफ के कान भरने लगी......... अशरफ के हर इम्तहान में मैं फेल रही सलाद खाने वाली लडकी को वो कबाब खाने की जिद करता......... मगर धीरे-धीरे, मगर थोडी-थोडी मजबूरन आदि हो गई प्याज, लहसुन की......... मेरी आत्मा मुझे कसोटने लगी मैं उन जंजीरों के घाव भी किसे बताती जिसे मैने चाव से पहना था।
सुमन- छोटे से रास्ते मैं मोड कितने आ जाते हैं।
अस्मां बी- नावाकिफ रास्तों पर आंखे बंद कर चलना भी नहीं चाहिए......... बडे भयानक होते है कुछ मोड।
सुमन- रास्ते और भी तो होते है।
अस्मां बी- सभी खाई की ओर ले जा रहे थे।
सुमन- आप तो अन्जान थी, जो उन रास्तों से वाकिफ था उन्होनें नहीं चेताया।
अस्मां बी- जाने क्यूं उन्होने आंखों पे पट्टी बांध ली थी, उस समय लगा मेरी सांस के भीतर भी एक औरत मन है, मेरे हालात जानती थी उसने मेरा दोबारा निकाह कर दिया वो भी पिता की उम्र वाले आदमी से......... रउूआ था, मेरी उम्र की तो उसकी औलादें थी। यह मुझे बाद में पता चला, उसे मेरे मन से नहीं, अपने सुख दुख बांटने वाली बीवी नहीं बिस्तर पे साथ देने वाली औरत चाहिए थी, मेरे जिस्म पे वो यूं टूटता......... साला बूढा।
सुमन- इतना कुछ होता रहा फिर भी आपने अपने परिवार को कुछ नहीं बताया, क्या इसमें भी जिद थी ?
अस्मां बी- जिद्......... किस मुंह जाती, क्या फिर खून के आंसू रूलाने। उनकी आशा को मैं फिर जिन्दा नहीं करना चाहती थी।
सुमन- टूटी नहीं आप।
अस्मां बी- किस्मत ने ऐसा मौका ही नहीं दिया......... जो ना जीने दे नही थी और ना मरने, किस्मत में अभी हुक्म का इक्का बाकी था।
सुमन- हुकूम का इक्का ? (चौंकती)
अस्मां बी- ताश का पत्ता खोला है कभी।
सुमन- नहीं सुना है।
अस्मां बी- खेल किस्मत का या ताश के पत्ते का।
सुमन- ताश के पत्ते का.........
अस्मां बी- हां री, उस दिन मैं समझ नहीं पा रही थी, बूढा कुछ कहना चाहता था मगर कुछ कह नहीं पा रहा था......... दारू की गिलास होगे तक ले जाता मगर होठ बार बार सूखे ही रह जाते उसके हाथ हर वक्त जो मेरे बदन पे रेंगने को बेताब रहते थे वो मेरे बदन को छूने से कतरा रहे थे......... इच्छा हुई कि पूछूं क्या बात है दिल में तुम्हारे, फिर सोचा कि भाड में जाए इसने मन का रिश्ता बनाया ही कब था, जो नजरें मेरे बदन को घूरती रहती थी वो मेरी नजरों का सामना नहीं कर पा रहीं थी, फिर मनमसोस कर पूछने का
विचार बना ही रही थी मैं कि घडी मैं नौ के डंके बजने लगे......... वो बद्हवास सा चिखता उठा, ’’क्या रात के नौ बज गए वो लोग आते ही होंगे......... बाहर का दरवाजा बन्द है कि नहीं देखता हूं‘‘.........अनहोनी हमेशा बिन कहे आती है मगर उल्टे पांव ही हैदरमियां दौडते हुए आ गए......... ’’मुझे थोडी और मोहल्लत दो सुल्ताना बाई‘‘ वो गिडगिडाता हुआ बोला। ’’सुल्ताना बाई जुबान और वादे की पक्की औरत है तूने जो समय मांगा था मैने दिया, अब तूं अपना वादा पूरा कर‘‘ वो पान चबाती बोली। चार पांच मुशटंडे भी साथ लायी थी। मैं यह माजरा समझ पाती इससे पहले सुल्ताना बाई बोल पडी ’’बेगम तेरे शोहर ने तुझे पचास हजार मैं बेच दिया‘‘ उसके लिए कहना कितना सरल था अचानक ऐसा सुनना सुन्न सी हो गई थी मैं......... वो आगे भी बोलती रही मगर उस समय ऐसा लगा मानो मेरे सुनने की शक्ति नही उसके बोलने की ताकत चली गई......... मेरा दिमाग सुन्न हो गया आंखे पथरा गई।
सुमन- आश्चर्य हो रहा है मुझे।
अस्मां बी- मेरी उस हालत पे।
सुमन- नहीं।
अस्मां बी- तो।
सुमन- इसलिए कि इन्सान अपने आप को कहां लिये जा रहा है।
अस्मां बी- गर्त की ओर।
सुमन- और सुल्ताना बाई.........।
अस्मां बी- कोठे की ओर.........।
सुमन- (आश्यर्च) कोठे की ओर.........।
अस्मां बी- ख्वाहिशें आदमी की खत्म नहीं होती मगर पांव चादर जितना ही फैलाना चाहिए ना पत्तों के खेल में बहुत रूपया जेवर खोया उसने, जमीन जायदाद काफी उसके बाप दादा छोडकर मरे थे। सूद से कमाता था,......... मगर रण्डीबाजी की लत ले डूबी, पर लत इतनी जल्दी कैसे किसी का पीछा छोड दे......... सोचा होगा क्यों ना सुल्ताना बाई से कर्जा लेकर पत्तों में किस्मत आजमाई जाए......... शायद कुछ भरपाई हो सके......... सुल्ताना बाई......... रण्डीबाजी भी वही किया करती था।
सुमन- मगर आपको दांव पे लगाना।
अस्मां बी - दांव पे लगाना नहीं री ......... गिरवी रखना और उसके पास था ही क्या जिसपे हक जमा सकता......... जो कुछ था उस पे हुकुमत औलाद की थी।
सुमन - अपनी बीवी को......... एक इन्सान को......... उफ ! आश्चर्य है मेरे लिए।
अस्मां बी - आदमजात औरत को अपनी प्रोपर्टी से कम नहीं समझता।
सुमन - (गुस्सा) बकवास......... माय फुट।
अस्मां बी - भडकती काहे को है री मगज ठण्डा रख......... (पानी का गिलास पकडाती)
सुमन - (पानी पीने के बाद) .........थैंक्यूं ! फिर.........
अस्मां बी - उस दिन पहली बार छः महीनों में हैदर मियां की आंखों में आंसूं देखे वो भी मेरे लिए बोला ’’अस्मां बहकावे में आ गया था, लालच में भटक गया था, नशे में मैने तुम्हे कब पचास हजार की एवज में दाव पे लगा दिया पता ही नहीं चला......... मगर पाई पाई इकट्ठा कर मैं तुम्हें ले आऊंगा मुझे अपनी जिद की इतनी बडी कीमत चुकानी पडेगी सोचा ही नहीं था। (सुबकना).........बहुत रोयी चिलायी मैं मगर बचाता भी कौन घसीटते हुए ले गए और बैठा दी मुझे कोठें पे, हैदरमियां की पाई पाई के बदले मेरे रोम रोम का सौदा हुआ......... ’ताजामाल‘ है कह कह कर सुल्ताना ने मुझे कई महीन तक दिन में कई बार लोगों के बिस्तर पे परोसा मुझे......... मुहं मांगे दाम कमाती।
सुमन - बडा ताज्जुब है।
अस्मां बी - किस बात का ?
सुमन - क्या उस समय पुलिस के पास जाने, अखबार मे सूचना देने का कुछ नही सूझा।
अस्मां बी - (हंसी) क्या गुलामों को कभी आजाद रखा जाता है कभी।
सुमन - कितनी बद्किस्मती है !
अस्मां बी - दोष भी किसे देती।
सुमन - हैदरमियां कभी आया ?
अस्मां बी - नहीं, सूचना मिली थी।
सुमन - कैसी ?
अस्मां बी - कि इन्तकाल हो गया उसका।
सुमन - कब ?
अस्मां बी - करीब पांच-छः माह बाद सुल्ताना ने सूचना दी कि अस्मां बाई मुकद्दर खराब है तुम्हारा, मगर मेरे लिए बेहद अच्छा, यूं लगा -
’’जीए जा रहा था सदियों से एक खण्डहर यू भी अपने एक अतीत में,
रास नहीं आया ये जमाने को और एक जलजले ने उसे ही अतीत कर दिया,
कहा कि हैदर मियां सदमे मे चल बसा‘‘।
सुमन - ओ शिट, बहुत बुरा हुआ......... अस्मां बी आपकी आप बीती से मेरा रोम रोम खडा हो रहा हैं, हो सकता है आंसू भी छलक पडे।
अस्मां बी - क्या मुझे रूलाना चाहती हो, अगर मेरी आंख में आंसू रचना ने देखा तो फिर डांटेंगी......... आती ही होगी।
सुमन - हां......... कहां गई है वो?
अस्मां बी - चाय बनाकर ला रही होगी ना......... उसकी हसरत भी पूरी हो जाए यही प्रार्थना है।
समन - कैसी हसरतें अस्मां बी......... (रचना चाय की ट्रे व बिस्कुट लेकर आती हैव टेबल पर रख दोनो को एक-एक कप पकडा देती है और स्वयं ले लेती है)
अस्मां बी - इतनी देर कैसे लगा दी बेटी तुमने ?
रचना - जी......... जी वो बिस्किट घर में......... (सकपकाती)
सुमन - (बात काटती) तो क्या बिना बिस्किट मुझे चाय नही पिला सकती थी जो बाजार लेने गई।
रचना - इच्छा तो नाश्ता कराने की थी मगर इस समय अभी कचौरी-समोसा ताजा नही बने है इसलिए बिस्किट लाना बेहतर समझी।
सुमन - (हंसती) तो बिना खिलाए चाय नहीं पिलाती मुझे।
रचना - (हंसती) बिल्कुल अगली बार आप खाना खाकर ही चाय पिएगी।
सुमन - बाप रे बाप ! धमकी है ये।
रचना - नहीं, अतिथि सत्कार है ये।
सुमन - शुक्रिया मेहमान नवाजी का। (बिस्किट खाती)
अस्मां बी - पूरा घर संभालती है ये, सोचती हूं कि अगर ये नहीं होती तो क्या होता मेरा।
रचना - बी ! गलत बल्कि आप नही होती तो मैं कहां होती।
अस्मां बी - भूल जा री उस मनहूस वक्त को......... खैर छोड इस बात को......... चाय पकडा ठण्डी हो रही है (रचना दोनो को चाय के कप पकडाती है और पीने लगते हैं)
सुमन - कभी-कभी कितना अजीब सा लगता है कभी खून के रिश्ते भी अपना हक पूरा नहीं निभा पाते तो कभी अन्जान भी अपनों से बन जाते है।
रचना - सही कहती है आप।
सुमन - बी ! बताऐंगी आप, फिर क्या हुआ ?
अस्मां बी - फिर...फिर हां....मैं उस फलक पें बैठी थी जिससे और बुरा मेरा क्या हो सकता था। कोठा सिर्फ कोठा......... औरत की आबरू बिकने के बाद रहता ही क्या है उसके पास......।
रातें ठलती रहीं,
हम यूं ही चलते रहे,
बुझे बुझे दिनों को हम,
रोशन यूं ही करते रहे।

जाने क्यूं सुल्ताना को मेरे से धीरे-धीरे लगाव होता गया अक्सर वो सुख दुख की अपनी बााते किया करती थी......... ऊब चुकी थी वो अब इस धन्धे से मगर मजबूरी थी, कईं घरों का चूल्हा भी तो बदन से जला करता था और फिर वेश्या को सलीके की नौकरी भी तो कौन देता भला।

सुमन - यकीन नहीं होता।
अस्मां बी - होगा भी कैसे वेश्या को वेश्या ही समझा है ना।
सुमन - मेरा मतलब यह नहीं था।
अस्मां बी - तो साफ-साफ बोलो ना।
सुमन - सुल्ताना.........।
अस्मां बी - सत्तर बरस का बोझा लिए चल बसी वो......... चार साल पहले मुझे अपनी बेटी बनाने के साथ-साथ वसीयत का वारिस भी बनाया, मगर मरते-मरते उसकी जुबां पर बार-बार यही था ’मुझे मुक्ति दिला देना‘ ’मुझे मुक्ति दिला देना‘।
(रचना उनकी बातें बडे गौर से सुन रही थी)
सुमन - किसी बात की......... ?
अस्मां बी - (हंसती) विधाता हिसाब किताब तो सभी का रखता है, अपने अन्तिम दिनों में वो अक्सर बडबडाया करती थी ’’जाने कितनी लडकियों की हया लगी होगी मुझे, जो बिमारी मे
मैं भुगत रहीं हूं......... जाने कितनी मासूमों को अपना तन बेचने को मजबूर किया।‘‘
सुमन - पश्चाताप हो रहा था।
अस्मां बी - चारा भी क्या था, हया तो लगनी ही थी, जाने मैने भी कितनी दी होगी।
सुमन - क्या थी ऐसी ख्वाहिश ?
अस्मां बी - जो कुछ धन-दौलत प्रोपर्टी थी उसे बेच कर उन्हीं के बीच बांट देना जो तन बेचने के लिए मजबूर है ताकि वे स्वाभिमानी से जीवन जी सके।
सुमन - क्या मकसद पूरा हुआ।
अस्मां बी - ये आप शहर मे पता किजिए मैं क्या बोलूं, अगर ना होतो हाथ कंगन को आरसी क्या।
सुमन - यानि.........।
अस्मां बी - रचना है प्रत्यक्ष उदाहरण।
सुमन - (चौंकती) रचना......... यकीन नहीं होता, इतनी प्यारी सी लडकी......... किस कारण से ?
रचना - अन्धी हो गई थी मैं विश्वास कर लिया था अपने ही परिचित पे......... अब अगर वो मुम्बई में मिल गया तो मैं उसका वो हश्र करूंगी जो उम्र भर याद रखेगा (दंात भींचती) (रूआंसा)
अस्मां बी - रोले बेटा रो ले थोडा मन हल्का हो जाएगा......... हमेशा गुमसुम चुपचाप सी रहती है मगर अब कभी-कभी तू कैसी भी ठोकर पूरी उम्र नहीं खाएगी.........।
सुमन - कितनी तरह की कौम है दुनिया मे हर फितरत की, कोई जान पे खेल कर कुछ हासिल करना चाहता है लेकिन कोई दिल से खेल कर क्या हासिल करना चाहेगा....उफ.......।
रचना - पता नहीं मगर अमूमन शख्स अन्धी दौड में शमिल होना चाहता है लेकिन बिना अन्जाम जाने अन्धी दौड अन्धे कुऐं तक की ही होती है।
सुमन - रोचक विषय है मेरे लिए.........।
रचना - हजारों पेट पे लात पड गई जब मुम्बई मे बार-क्लबों मे सरकार ने डांस बन्द करा दिया मानो कंगाली में आटा गीला होना......... मेरी हसरतें टूटती सी लगने लगी......... मां-बाप ने ताउम्र चाल ही देखी है चाहती थी उनकी अन्तिम सांसे खल में नहीं फलेट में टूटे, सौगात दू मै उन्हे फलैट का......... मेरे नेत्राहीन पिता अक्सर अपने एक प्यारे फलेट का सपना देखते हैं......... अपने छोटे भाई बहन को उस मुकाम तक पहुचाऊं कि लोग उन्हें सलाम करे......... मैं वो कमी उनको नहीं देना चाहती थी जो मैने देखी थी मैं नहीं पढ पायी अपनी गरीबी के कारण मगर मैं उन्हें इसका एहसास नही कराना चाहती थी मगर सब बेकार यू लगा जैसे किसी ने वपने छिन लिए मुझसे कसमसा उठी मगर करती भी तो क्या नाचने के शिवाय और आता भी कुछ नहीं था नौकरी नौकरानी बनने के अलावा कही मिलती नहीं थी जो मेरे सपनों को पाताल से भी कहीं नीचे ले जा रहा था......... एक दिन एक मित्रा के छलावे में आ गई इस उम्मीद में कि एक शादी के फक्ंशन में नाचने पर कम से कम दस हजार रूपये मिलेंगे मगर दूसरे शहर जाना पडेगा......... मजबूरी थी करती भी क्या ’’हां‘‘ कहना पडी चल पडी मैं उसके साथ मगर होना कुछ और ही था......... मुझे फंक्शन के बहाने होटल ले गया। धन्धा करवाना चाहा मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था......... जाने किसकी सूचना पर वहां अचानक पुलिस पहच गई वरना शायद आज मैं भी अस्मां बन गई होती। (भर्राना)
अस्मां बी - अगले दिन जैसे ही मैंने यह खबर पढी......... चल पडी पुलिस स्टेशन, छुडा लाई इसे।
रचना - एहसानमन्द हूं मैं अस्मां बी का मैं.........।
अस्मां बी - काहे का री, मुझे तुझ में एक आशा दिखाई दी थी (रचना गले लग सुबकती है) चुप हो जा वर्ना मैं रो दूंगी......... अच्छा बता तूने अपने घर पे यही सूचना भिजवायी थी ना कि तुझे अच्छी नौकरी मिल गई है इसलिए अचानक यहां आना पडा और जाते वक्त अपनी तनख्वाह १०,००० रू. ले जाना मत भूलना।
रचना- हां ! आफ साथ पन्द्रह दिन एक मुद्दत से लगे है मुझे ......... दिल दे बैठी हूं तुम्हें.......।
अस्मां बी - बहका मत मुझे (हंसती)......... फिर सुल्ताना बाई के इस घर मे अस्मां बी तन्हा हो जाएगी मुझे इतनी जल्दी किसी से प्यार क्यूं हो जाता है री (भर्राना)
रचना - जो खुद प्यार मे डूबा हो वो भला कैसे बता सकता है (भर्राना)
सुमन - अगर मैने किस्से नही सुने होते तो एक कहानी हकीकत कभी नही बन पाती मेरे लिए (टेप का बटन बन्द करती) अस्मां बी मेरे लिए आपकी मुलाकात अतिस्मरणीय रहेगी। पढने वाले भी ट्रू स्टोरी का कॉलम ’आशा बनाम अस्मां‘ को नहीं भूल नहीं पाऐंगे।
अस्मां बी - (भर्राना) पर मुझे कौन याद रखेगा.......... मैं हिन्दू होकर हिन्दू नहीं बन पायी और मुस्लिम होकर मुसलमान ना बन पायी, क्या जात, क्या धर्म होगा मेरा पता नहीं।
’’गुजरी जिन्दगी मलाल रही मेरी,
पर कज्जा के बाद तो गम ना देना।
फेंक देना बीच राह में मुझे मगर,
इल्तजा कफन सलीके से ओढा देना।

(प्रकाश धीरे-धीरे मद्धम हो जाता ह)

।।समाप्त।।

2 comments:

Anurag Choudhary said...

मेरा नाम Anurag Choudhary है और Fatehpur-Shekhawati में रहता हूं ।अंगरेजी में ब्लाग लिखता हूं । अंगरेजी में लिखना विविवशता है एक तो मेरा विषय ही ऐसा है और असल में मुझे Universal Key Board पर हिन्दी लिखनी आती ही नहीं है । हमारे क्षेत्र में ब्लागरों की संख्या नगण्य है । जो हैं वो भी SEO and Page Rank backlinks के प्रति उदसीन हैं । इस लिये मैं आप सभी महानु्भावों से निवेदन करता हूं कि सब आपस में जुडें आपस में Posts पर comment करें यही सब backlinks के आधार है । मेरा निवेदन सभी ब्लोग्गेर मित्रों को भेजें । मुझे कोई आदेश मेरे ब्लाग http://compualchemist.blogspot.in Via post comment या मेरी email-anuragchoudharyj@gmail.com पर भेजें ।

अर्चना चावजी Archana Chaoji said...

किसी किसी लिंक्स से होते हुए आज आपका ब्लॉग देखा ,नाटक की तीनों किश्त पढ़ी,मार्मिक कहानी एक औरत की ...